📖 दिल का दरिया
नौकर का डर
अगली सुबह, आदित्य और आर्या ने नौकर के घर जाने का फैसला किया। आदित्य ने आर्या से कहा, 'हमें उस नौकर से बात करनी होगी, जो माँ के इशारे पर ज़मीन के कागज़ात बदलने में शामिल था।' आर्या ने सिर हिलाया, लेकिन उसके मन में डर था। वे दोनों गाँव के पास बने उस छोटे से घर की ओर निकल पड़े। रास्ते में आर्या ने कहा, 'अगर सुधा जी को पता चल गया तो?' आदित्य ने उसका हाथ थामते हुए कहा, 'हमें सच्चाई चाहिए, चाहे कुछ भी हो जाए।' घर के पास पहुँचकर उन्होंने देखा कि दरवाज़ा बंद था।
आर्या ने आवाज़ दी, 'भाई साहब, दरवाज़ा खोलो। हम तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी चाहते हैं।' थोड़ी देर बाद एक बूढ़ी औरत ने दरवाज़ा खोला। वह नौकर की माँ थी। उसने डरते हुए पूछा, 'तुम लोग कौन हो?' आर्या ने प्यार से कहा, 'माँ, मैं आर्या हूँ।
क्या तुम्हारा बेटा घर पर है?' बूढ़ी औरत ने झिझकते हुए कहा, 'वो... वो अभी बाहर गया है।' लेकिन उसकी आँखों में डर साफ़ झलक रहा था। आर्या ने उसकी माँ से पूछा, 'माँ, क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे बेटे ने सुधा जी के लिए काम किया था?' बूढ़ी औरत ने घबराकर कहा, 'नहीं, मुझे कुछ नहीं पता।' उसी समय अंदर से एक आवाज़ आई, 'माँ, कौन है?' नौकर दरवाज़े पर आया। उसने आदित्य और आर्या को देखा तो उसका चेहरा पीला पड़ गया।
वह जल्दी से अंदर जाने लगा, लेकिन आर्या ने उसे रोका, 'रुको, हमें तुमसे बात करनी है।' नौकर ने घबराकर कहा, 'मुझे कुछ नहीं पता। मैं किसी से नहीं मिल सकता।' आदित्य ने सख्ती से कहा, 'हमें पता है कि तुमने सुधा के कहने पर ज़मीन के कागज़ात बदले थे। हमें सच बताओ।' नौकर काँपने लगा। उसने डरते हुए कहा, 'मुझे माफ़ कर दो, मैं कुछ नहीं बता सकता।
वो मुझे मार देंगी।' आर्या ने उसे समझाने की कोशिश की, 'हम तुम्हारी मदद करेंगे। हमें सच चाहिए, ताकि सुधा की साज़िश सामने आ सके।' नौकर ने सिर हिलाया, 'नहीं, नहीं। मैं कुछ नहीं बोल सकता। मेरी माँ को खतरा हो जाएगा।' उसकी माँ ने डरते हुए कहा, 'बेटा, इन्हें बता दो।
सच्चाई छिपाकर नहीं रखी जा सकती।' लेकिन नौकर ने गुस्से से कहा, 'माँ, तुम चुप रहो।' उसने आदित्य और आर्या की तरफ देखा, 'तुम लोग यहाँ से चले जाओ। मैं कुछ नहीं जानता।' आर्या ने हार नहीं मानी, 'भाई, हम तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। बस सच बता दो।' नौकर ने दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की, लेकिन आदित्य ने उसे रोका, 'अगर तुमने सच नहीं बताया, तो हम पुलिस के पास जाएँगे।' नौकर डर गया, लेकिन फिर भी बोला, 'जाओ, जो करना है करो। मैं कुछ नहीं बोलूँगा।' वह दरवाज़ा पटककर अंदर चला गया।
आर्या और आदित्य बाहर खड़े रह गए। आर्या ने निराश होकर कहा, 'वह डरा हुआ है। सुधा ने उसे धमकी दी है।' आदित्य ने उसका हाथ पकड़ा, 'हमें कोई और रास्ता निकालना होगा।' आदित्य ने आर्या की तरफ देखा, 'तुमने उसे समझाने की बहुत कोशिश की। मुझे यकीन है कि वह डर के मारे कुछ नहीं बोल पा रहा है।' आर्या ने आह भरी, 'हाँ, लेकिन हमें सबूत चाहिए।' आदित्य ने उसका हाथ थामते हुए कहा, 'मुझे पता है।
मैं अपने पिता के पुराने वकील से मिलूँगा। शायद उनके पास कुछ कागज़ात हों।' आर्या ने आश्चर्य से पूछा, 'वकील साहब?' आदित्य ने समझाया, 'हाँ, वे मेरे पिता के बहुत पुराने वकील हैं। उन्होंने कई सालों तक हमारे परिवार के काम देखे हैं। शायद उन्हें ज़मीन के बारे में कुछ पता हो।' आर्या की आँखों में उम्मीद जगी, 'क्या वे हमारी मदद करेंगे?' आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा, 'मैं कोशिश करूँगा।
वे मेरे पिता के भरोसेमंद रहे हैं।' दोनों वहाँ से चलने लगे। रास्ते में आदित्य ने आर्या से कहा, 'तुम्हारी हिम्मत देखकर मुझे और भरोसा होता है। हम साथ मिलकर सच्चाई सामने लाएँगे।' आर्या ने उसकी तरफ देखा, 'धन्यवाद, आदित्य। तुम्हारे साथ होने से मुझे हिम्मत मिलती है।' आदित्य ने उसका हाथ कसकर पकड़ा, 'हम एक टीम हैं।
अब हम किसी भी हाल में सच्चाई छिपने नहीं देंगे।' उनकी आँखों में एक-दूसरे के लिए विश्वास और अपनापन झलक रहा था। आदित्य ने आर्या से कहा, 'चलो, हम वकील साहब से मिलते हैं, शायद उनके पास कुछ सबूत हों।' आदित्य ने आर्या से कहा, 'चलो, हम वकील साहब से मिलते हैं, शायद उनके पास कुछ सबूत हों।'






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