📖 दिल का दरिया
अनजान घर
आदित्य बिना कुछ कहे घर से बाहर चला गया, और आर्या उसे जाते हुए देखती रही। उसके मन में सवाल उठे, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह कुछ देर खड़ी रही, फिर रसोई में लौट आई। नाश्ते के बर्तन अभी भी पड़े थे।
उसने आस्तीन ऊपर चढ़ाई और बर्तन साफ करने लगी। पानी की आवाज़ और बर्तनों की खनक से घर की खामोशी टूट रही थी। तभी सुधा माँ वहाँ आईं। उन्होंने आर्या को काम करते देखा और मुस्कुराईं, लेकिन वह मुस्कान सच्ची नहीं थी।
बोलीं, "आर्या, आज दोपहर को हमारे यहाँ कुछ मेहमान आ रहे हैं। उनके लिए अच्छा खाना बनाना।" आर्या ने सिर झुकाकर कहा, "जी, माँ जी।" सुधा ने आगे कहा, "याद रखना, हमारे घर की बहू को हर काम में पारंगत होना चाहिए। अगर कुछ गड़बड़ हुई, तो अंजाम भुगतना पड़ेगा।" आर्या ने कोई जवाब नहीं दिया, बस काम में लग गई। उसने सोचा, 'मुझे अपनी काबिलियत साबित करनी है।' आर्या ने दोपहर के खाने की तैयारी शुरू की।
उसने तय किया कि वह पारंपरिक व्यंजन बनाएगी जो उसकी माँ ने उसे सिखाए थे। उसने दाल, सब्ज़ी, रोटी और चावल बनाने का सोचा। वह रसोई में सामान जुटाने लगी। तभी सुधा वहाँ आईं और बोलीं, "क्या बना रही हो?" आर्या ने विनम्रता से जवाब दिया, "दाल और सब्ज़ी, माँ जी।" सुधा ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा, "बस?
हमारे यहाँ मेहमानों के लिए कई तरह के पकवान बनते हैं। क्या तुम्हें कुछ और नहीं आता?" आर्या ने कहा, "मैं पूरी, कचौड़ी और हलवा भी बना सकती हूँ।" सुधा ने तंज़ किया, "अच्छा, तो दिखाओ।" आर्या ने काम शुरू किया। उसने आटा गूंथा, पूरी बेलने लगी। तभी सुधा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "रुको।
तुम्हें पता है, मेरा बेटा आदित्य बहुत अच्छा खाना खाता है। उसे बाज़ार का खाना पसंद नहीं। क्या तुम उसकी पसंद का ख्याल रख पाओगी?" आर्या ने कहा, "मैं कोशिश करूँगी, माँ जी।" सुधा ने उसका हाथ छोड़ा और बोलीं, "कोशिश से काम नहीं चलेगा। तुम्हें सिद्ध करना होगा।" आर्या ने फिर से काम शुरू किया।
उसने पूरी बनाई, सब्ज़ी पकाई। लेकिन सुधा ने हर चीज़ में कमी निकाली। "पूरी ज़्यादा तली है। सब्ज़ी में नमक कम है।" आर्या ने धैर्य नहीं खोया।
उसने फिर से बनाया। इस बार सुधा ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी नज़रों में तिरस्कार था। आर्या को बुरा लगा, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह सोचने लगी, 'मुझे अपनी मेहनत से सबको दिखाना है।' उसने खाना तैयार किया और मेहमानों के आने का इंतज़ार करने लगी।
दोपहर को मेहमान आए। वे आदित्य के पिता के दोस्त थे। उन्होंने खाना खाया और आर्या की तारीफ़ की। "बहुत स्वादिष्ट खाना है।" सुधा ने मुस्कुराकर कहा, "हाँ, हमारी बहू ने बनाया है।" लेकिन उसकी आवाज़ में गर्व नहीं था।
आर्या ने सबको खाना परोसा। उसकी मेहनत रंग लाई। मेहमानों के जाने के बाद, सुधा ने आर्या को बुलाया और कहा, "आज तो ठीक रहा। लेकिन यह मत सोचना कि सब कुछ इतना आसान है।
तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है।" आर्या ने सिर झुकाया। तभी घर के नौकर, रामू काका, जो बुज़ुर्ग थे, वहाँ आए। उन्होंने आर्या से धीरे से कहा, "बहू जी, आपने आज बहुत अच्छा काम किया। लेकिन सावधान रहना, मालकिन आपको पसंद नहीं करतीं।
वे आपको नीचा दिखाने की कोशिश करेंगी।" आर्या ने उनकी बात सुनी और कहा, "धन्यवाद, रामू काका। मैं सावधान रहूँगी।" उसे लगा कि घर में कम से कम कुछ लोग उसका साथ दे रहे हैं। उसने ठान लिया कि वह हार नहीं मानेगी। वह अपनी जगह बनाकर रहेगी।
शाम को सुधा ने आर्या को बुलाया और एक और काम सौंपा। उसने कहा, "कल सुबह हमारे यहाँ एक ज़रूरी मेहमान आ रहे हैं। उनके लिए नाश्ता और खाना बनाना है। अगर तुमने कोई गलती की, तो मैं तुम्हें घर से निकाल दूँगी।" आर्या ने सुना और उसके मन में डर पैदा हुआ, लेकिन उसने हिम्मत दिखाई।
सुधा आर्या को एक और काम सौंपती है और धमकी देती है कि अगर वह नाकाम रही तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा।






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