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📖 दिल का दरिया

एक मौका

705 words

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आर्या ने नौकर से मिली जानकारी को मन ही मन दोहराया। सुधा ने उसके पिता को बर्बाद किया था। यह सोचकर उसका खून खौल उठा। लेकिन वह जानती थी कि बिना सबूत के वह कुछ नहीं कर सकती। उसने ठान लिया कि वह सुधा की हर हरकत पर नज़र रखेगी। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। आर्या ने दरवाज़ा खोला तो सामने सुधा खड़ी थी। सुधा ने तिरस्कार भरी नज़र से उसे देखा और कहा, 'कल घर में पारिवारिक समारोह है। तुम उसमें यही पुराने कपड़े पहनकर जाना।' आर्या ने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिला दिया। सुधा के जाते ही आर्या ने सोचा, 'यह मेरा मौका है। मैं दिखा दूँगी कि मैं किसी से कम नहीं हूँ।' उसने पुरानी साड़ी उठाई और उसे देखने लगी। उसके मन में एक योजना बनने लगी। अगले दिन सुबह से ही घर में समारोह की तैयारियाँ शुरू हो गईं। आर्या ने अपने कमरे में बैठकर पुरानी साड़ी को बदलने का फैसला किया। उसने अपनी सिलाई की कला का उपयोग करते हुए साड़ी के किनारों पर सुंदर कढ़ाई कर दी। उसने साड़ी के साथ एक पुराना दुपट्टा भी सजाया। जब वह तैयार हुई, तो वह बिल्कुल अलग लग रही थी। समारोह में जाते हुए उसने देखा कि सुधा मेहमानों का स्वागत कर रही है। आर्या को देखकर सुधा का चेहरा उतर गया। उसने गुस्से से पूछा, 'तुमने यह क्या पहना है?' आर्या ने शांति से जवाब दिया, 'आपने कहा था पुराने कपड़े पहनूँ, मैंने वही पहना है।' सुधा ने ताना मारा, 'यह कढ़ाई किसने की? तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं, फिर यह सब कैसे?' आर्या ने मुस्कुराते हुए कहा, 'यह मेरी मेहनत है। मैंने खुद सिलाई की है।' इतने में कुछ मेहमान वहाँ आ गए। उन्होंने आर्या की साड़ी देखकर तारीफ की, 'वाह, कितनी सुंदर कढ़ाई है! आपने खुद की है?' आर्या ने सिर हिलाया। मेहमानों ने उसकी प्रशंसा की, 'आप बहुत कुशल हैं।' सुधा का चेहरा देखने लायक था। वह गुस्से से लाल हो गई। उसने आर्या को एक तरफ ले जाकर फुसफुसाई, 'तुम्हें लगता है तुम कितनी समझदार हो? यह सब दिखावा है।' आर्या ने शांत स्वर में कहा, 'मैंने कुछ गलत नहीं किया।' सुधा ने जोर से कहा, 'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे सामने ऐसा करने की?' लेकिन तभी एक और मेहमान आया और उसने आर्या की साड़ी की तारीफ की। सुधा को चुप रहना पड़ा। आर्या ने मेहमानों के बीच घुलमिलकर बातें कीं। उसकी सादगी और मिठास ने सबका दिल जीत लिया। सुधा की योजना उल्टी पड़ गई। वह चाहती थी कि आर्या अपमानित हो, लेकिन उल्टे आर्या की तारीफ हो रही थी। समारोह के दौरान आदित्य भी वहाँ मौजूद था। वह दूर से आर्या को देख रहा था। उसने पहली बार उसे इतने आत्मविश्वास से बात करते देखा। उसकी साड़ी पर की गई कढ़ाई ने उसे हैरान कर दिया। वह सोचने लगा, 'यह औरत इतनी कुशल है, फिर चोरी क्यों करेगी?' उसके मन में संदेह पैदा हुआ। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। आर्या ने जब आदित्य को देखा, तो उसकी नज़रें चार हुईं। आर्या ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन आदित्य ने मुँह फेर लिया। फिर भी आर्या को लगा कि उसकी नज़र में कुछ बदलाव आया है। वह सोचने लगी, 'शायद वह मुझ पर विश्वास करने लगा है।' समारोह के अंत में, एक बुज़ुर्ग महिला आर्या के पास आई और बोली, 'बेटा, तुमने आज सबका दिल जीत लिया। तुम्हारी सादगी और मेहनत देखकर लगता है कि तुम इस घर की शोभा हो।' आर्या की आँखों में आँसू आ गए। उसे लगा कि उसकी मेहनत रंग लाई है। सुधा यह सब देख रही थी। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था। वह आर्या के पास आई और बोली, 'तुम्हें लगता है तुम जीत गईं? यह सब झूठ है।' आर्या ने शांति से जवाब दिया, 'मैंने कुछ नहीं किया। मैंने तो बस अपना काम किया।' सुधा ने उसका हाथ पकड़कर कसा और फुसफुसाई, 'मैं तुम्हें जल्द ही इस घर से निकालकर रहूँगी।' सुधा के शब्द आर्या के कानों में गूँज रहे थे। वह जानती थी कि सुधा अपनी धमकी पर अमल करेगी। आर्या ने सोचा, 'अब मुझे और सबूत जुटाने होंगे।' उसने तय किया कि वह सुधा की हर हरकत पर नज़र रखेगी। सुधा ने गुस्से में आर्या के कान में फुसफुसाकर कहा, 'मैं तुम्हें जल्द ही इस घर से निकालकर रहूँगी।' और वहाँ से चली गई।
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