📖 दिल का दरिया
नई दुल्हन
शादी की रात, आर्या ने छोटे से कमरे में अपना सामान रखा। दीवारों पर महँगे वॉलपेपर और फ्रेंच खिड़कियाँ थीं, लेकिन कमरे में ठंडक थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बिस्तर पर बैठ गई। उसकी नज़र सामने की दीवार पर लगी एक तस्वीर पर पड़ी।
एक लड़की, आदित्य के साथ, हँसती हुई। आर्या का दिल धड़क गया। उसने सोचा, 'यह कौन है?' उसी समय आदित्य कमरे में आया। उसने बिना कुछ कहे, अपना मोबाइल उठाया और बाहर चला गया।
दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। आर्या अकेली रह गई, तस्वीर को देखती रही। उसकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने खुद को संभाला। उसने सोचा, 'मुझे यहाँ अपनी जगह बनानी है।' अगली सुबह, आर्या ने सुबह पाँच बजे उठकर अपना सामान व्यवस्थित किया।
उसने सोचा कि नए घर में सबसे पहले रसोई में मदद करनी चाहिए। वह रसोई में गई, जहाँ नौकरानी काम कर रही थी। आर्या ने नमस्ते किया और काम में हाथ बँटाने लगी। तभी सुधा जी आईं।
उन्होंने आर्या को देखकर तिरस्कार से कहा, "अरे, दुल्हन रसोई में? जाओ, पहले नाश्ता बनाओ। मुझे देखना है कि गाँव की लड़की क्या बनाती है।" आर्या ने विनम्रता से कहा, "जी, माँ जी। आपको क्या पसंद है?" सुधा ने व्यंग्य किया, "हमें तो बस दाल-रोटी से काम चलता है, लेकिन तुमसे बनेगा भी क्या?" आर्या ने चुपचाप आटा गूंधना शुरू किया।
सुधा ने उसकी हर हरकत पर टिप्पणी की, "आटा ज़्यादा सख्त है। रोटी पतली बनाओ।" आर्या ने अपना आपा नहीं खोया। उसने सोचा, 'मैं अपनी मेहनत से सबको दिखा दूँगी।' उसने गरमागरम रोटियाँ बनाईं, सब्ज़ी बनाई, और सबको नाश्ता परोसा। सुधा ने चखा और मुँह बनाया, "नमक कम है।" आर्या ने तुरंत कहा, "माफ़ कीजिए, माँ जी।
अगली बार ध्यान रखूँगी।" सुधा ने उसे और काम देते हुए कहा, "आज घर की सफाई भी करनी है। हमारे यहाँ नौकरानी है, लेकिन तुम्हें भी सीखना चाहिए।" आर्या ने सिर झुकाया और काम में जुट गई। दोपहर तक वह थक गई थी, लेकिन उसने किसी से शिकायत नहीं की। शाम को, घर के बुजुर्ग, आदित्य के दादा जी, बाहर बैठे थे।
आर्या ने उन्हें चाय पिलाई। दादा जी ने पूछा, "बेटी, कैसी हो?" आर्या ने मुस्कुराकर कहा, "सब ठीक है, दादा जी।" दादा जी ने उसकी ओर देखा और कहा, "तुमने आज बहुत काम किया। हमारे घर की बहू को इतनी मेहनत नहीं करनी चाहिए।" आर्या ने विनम्रता से कहा, "यह मेरा घर है, दादा जी। मुझे खुशी है कि मैं कुछ कर सकती हूँ।" दादा जी ने सुधा से कहा, "सुधा, बहू को इतना मत परेशान करो।
वह अच्छी है।" सुधा ने मुँह बनाया, लेकिन कुछ नहीं बोली। आर्या की आँखों में चमक आई। उसे लगा कि उसकी मेहनत रंग लाई। उसने सोचा, 'कम से कम दादा जी तो मेरी कद्र करते हैं।' उसी समय आदित्य ऑफिस से लौटा।
उसने आर्या को देखा, जो थकी हुई थी, लेकिन फिर भी मुस्कुरा रही थी। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और सीधे अपने कमरे में चला गया। आर्या ने उसकी ओर देखा और सोचा, 'वह मुझसे बात क्यों नहीं करता? क्या मैं उसे पसंद नहीं हूँ?' रात के खाने के बाद, आर्या रसोई में बर्तन धो रही थी।
आदित्य वहाँ से गुज़रा। उसने एक पल के लिए रुककर उसे देखा। आर्या ने उसकी ओर देखा, लेकिन उसने कोई बात नहीं की। वह चुपचाप ऑफिस चला गया।
आदित्य नाश्ता बनाते हुए आर्या को देखता है, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं देता और चुपचाप ऑफिस चला जाता है।






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