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📖 दिल का दरिया

परिवार का दबाव

671 words

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सुधा के जाने के बाद आर्या कुछ देर उसी जगह खड़ी रही। उसके कानों में अभी भी वह धमकी गूँज रही थी। उसने गहरी साँस ली और अपने कमरे की ओर चल दी। रास्ते में उसने सोचा, 'अगर सुधा ने बुजुर्गों को कुछ बताया, तो मुश्किल होगी।' अगली सुबह, जैसे ही आर्या ने आँखें खोलीं, उसे लगा कि घर में कुछ अजीब सन्नाटा है। वह जल्दी से तैयार होकर नीचे गई। वहाँ बुजुर्गों के कमरे से आवाज़ें आ रही थीं। उसने झिझकते हुए अंदर झाँका। सुधा वहाँ बैठी थी और बुजुर्गों से कह रही थी, 'आपको पता है, कल समारोह में उसने मेरी बेइज्जती की। उसने जानबूझकर मेरी बात नहीं मानी और सबके सामने मुझे अपमानित किया।' बुजुर्गों के चेहरे पर गुस्सा साफ़ दिख रहा था। आर्या का दिल बैठ गया। वह जानती थी कि सुधा उसे फँसाने के लिए कुछ भी कर सकती है। आर्या ने हिम्मत करके कमरे में कदम रखा। उसने सिर झुकाकर सभी बुजुर्गों को प्रणाम किया। उसकी आवाज़ में विनम्रता थी, 'मैंने कल किसी का अपमान करने की कोशिश नहीं की। मैंने तो बस अपना काम किया।' सुधा ने तुरंत कहा, 'तुम्हारा काम? तुमने तो मेरी हर बात का विरोध किया। तुम्हें लगता है तुम इस घर की बहू बनकर सबको सिखाओगी?' बुजुर्गों में से एक, जो सबसे बड़े थे, बोले, 'बहू, हमें तुमसे उम्मीद थी कि तुम घर की मर्यादा का ध्यान रखोगी। लेकिन तुमने ऐसा किया, जिससे हमें शर्म आई।' आर्या की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने उन्हें रोक लिया। उसने कहा, 'मैं माफी चाहती हूँ अगर मुझसे कोई गलती हुई हो। मैं आप सबकी सेवा करना चाहती हूँ।' उसने झुककर बुजुर्गों के पैर छुए। सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा, 'माफी से काम नहीं चलेगा। तुम्हें अपनी जगह पता होनी चाहिए।' बुजुर्गों ने सुधा की बात का समर्थन किया। उन्होंने आर्या को चेतावनी दी, 'अगर तुमने दोबारा ऐसा किया, तो हम तुम्हें घर से निकाल देंगे।' आर्या ने सिर झुकाकर कहा, 'जैसी आपकी मर्जी।' लेकिन उसके मन में आग जल रही थी। वह जानती थी कि सुधा ने ही यह सब रचा है। उसने बुजुर्गों की सेवा करने का फैसला किया। वह उनके लिए चाय लाई, उनके पंखे ठीक किए, और उनकी हर ज़रूरत का ध्यान रखा। बुजुर्गों में से एक ने उसकी मेहनत देखकर धीरे से कहा, 'बहू, तुम अच्छी हो, लेकिन सुधा की बात भी माननी चाहिए।' आर्या ने मुस्कुराकर जवाब दिया, 'जी, मैं कोशिश करूँगी।' आदित्य उस दिन घर पर था। उसने सुबह से ही बुजुर्गों के कमरे से आवाज़ें सुनी थीं। वह दरवाज़े के पास खड़ा होकर सब कुछ देख रहा था। उसने देखा कि कैसे आर्या ने बुजुर्गों के सामने सिर झुकाया और उनकी सेवा की। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। आदित्य ने सोचा, 'यह लड़की कितनी मजबूत है।' लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। जब आर्या बुजुर्गों के लिए चाय लेकर आई, तो उसकी नज़र आदित्य से मिली। आर्या ने उसकी ओर देखा, लेकिन उसकी आँखों में कोई उम्मीद नहीं थी। उसे लगा कि आदित्य भी सुधा के पक्ष में है। वह चुपचाप चली गई। आदित्य ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन वह भी कुछ नहीं बोला। उसके मन में एक अजीब सा द्वंद्व था। वह आर्या की सराहना करना चाहता था, लेकिन उसकी माँ के सामने वह कुछ नहीं बोल सकता था। बुजुर्गों में से एक ने आर्या की सेवा से प्रभावित होकर उससे कहा, 'बहू, तुमने आज हमें खुश कर दिया। हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं है।' आर्या ने सिर झुकाकर धन्यवाद कहा। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, लेकिन उसकी आँखों में नमी थी। वह जानती थी कि यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। शाम को, जब सब लोग अपने-अपने कमरों में चले गए, आर्या अपने कमरे में बैठी थी। उसने सोचा, 'आज मैंने बुजुर्गों को खुश कर लिया, लेकिन सुधा चुप नहीं बैठेगी।' उसने आदित्य की डायरी निकाली और उसे पढ़ने लगी। अचानक उसे कुछ ऐसा मिला जिससे उसकी आँखें फटी रह गईं। आदित्य ने आर्या की तरफ देखा, फिर चुपचाप कमरे से बाहर चला गया, जिससे आर्या की आँखें भर आईं।
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