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📖 दिल का दरिया

आदित्य का भरोसा

576 words

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नौकर की माँ की बात सुनकर आर्या के कदमों ने ज़मीन छोड़ दी। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी, लेकिन उसने खुद को संभाला। वह जानती थी कि अब उसे आदित्य को सब कुछ बताना ही होगा। रात का अंधेरा गहरा था, और घर की रोशनी दूर से ही उसे रास्ता दिखा रही थी। उसने गहरी साँस ली और कदम बढ़ाए। हर कदम पर उसे लग रहा था कि सुधा जी की नज़रें उसका पीछा कर रही हैं, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसके मन में एक ही बात थी - आदित्य को सच बताना है, चाहे कुछ भी हो जाए। आर्या सीधे आदित्य के कमरे की तरफ बढ़ी। दरवाज़े पर पहुँचकर उसने झिझकते हुए दस्तक दी। अंदर से आदित्य की आवाज़ आई, 'कौन?' आर्या ने धीरे से कहा, 'मैं हूँ, आर्या।' कुछ पल बाद दरवाज़ा खुला, और आदित्य हैरानी से उसे देखने लगा। 'इतनी रात को? क्या हुआ?' उसने पूछा। आर्या ने कमरे में घुसकर दरवाज़ा बंद कर लिया और सीधे मुद्दे पर आ गई। 'आदित्य, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।' उसकी आवाज़ में हल्का सा काँप रहा था। आदित्य ने उसे बैठने का इशारा किया, लेकिन आर्या खड़ी रही। उसने सारी बात एक साँस में बता दी - कैसे नौकर की माँ ने उसे बताया कि सुधा ने उसके पिता की ज़मीन के कागज़ों में हेराफेरी की थी, और कैसे नौकर को झूठी गवाही के लिए रिश्वत दी गई थी। आदित्य ने पहले तो यकीन नहीं किया। उसने सिर हिलाते हुए कहा, 'आर्या, तुम गलत समझ रही हो। मेरी माँ ऐसा नहीं कर सकतीं।' आर्या ने उसकी आँखों में देखा और कहा, 'मैं सच कह रही हूँ। तुम्हें नौकर से मिलना चाहिए, वो सब बता देगा।' उसी वक्त दरवाज़ा खुला और सुधा जी अंदर आ गईं। उन्होंने आर्या की तरफ देखा और तीखी आवाज़ में कहा, 'तुम मेरे बेटे के कमरे में इस वक्त क्या कर रही हो? और हाँ, मैंने सब सुन लिया। तुम झूठ बोल रही हो, आर्या। मैंने कभी किसी की ज़मीन नहीं हड़पी।' आदित्य दुविधा में पड़ गया। उसने अपनी माँ की तरफ देखा, फिर आर्या की तरफ। 'माँ, आर्या ऐसा क्यों कहेगी?' सुधा ने आर्या की तरफ इशारा करते हुए कहा, 'क्योंकि वो मुझे बदनाम करना चाहती है, ताकि तुम उस पर तरस खाओ। ये सब उसकी साज़िश है।' आर्या की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने खुद को रोके रखा। 'मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ। आदित्य, मुझ पर विश्वास करो।' आदित्य ने अपनी माँ की तरफ देखा, फिर आर्या की तरफ। उसकी आँखों में उलझन थी, लेकिन जब उसने आर्या की आँखों में झाँका, तो उसे वहाँ सच्चाई दिखी। उसने गहरी साँस ली और कहा, 'माँ, मैं आर्या पर विश्वास करता हूँ।' सुधा के चेहरे का रंग उड़ गया। 'क्या? तुम मेरी बात नहीं मानोगे?' आदित्य ने दृढ़ता से कहा, 'मैं सच्चाई जानना चाहता हूँ। आर्या ने कभी झूठ नहीं बोला।' सुधा गुस्से में कमरे से बाहर चली गईं, लेकिन आदित्य ने आर्या का हाथ पकड़ लिया। 'मुझे माफ़ करना, आर्या। मुझे पहले विश्वास नहीं हुआ। लेकिन अब मैं तुम्हारे साथ हूँ।' आर्या की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वे खुशी के थे। आदित्य ने उसे भरोसा दिलाया, 'मैं अपने पिता के पुराने कागज़ात ढूँढ़ूँगा। सच्चाई ज़रूर सामने आएगी।' आर्या ने सिर हिलाया और धीरे से कहा, 'धन्यवाद, आदित्य।' आदित्य ने आर्या का हाथ थामते हुए कहा, 'अब हम साथ मिलकर सच्चाई सामने लाएंगे।' आदित्य ने आर्या से कहा, 'मैं तुम पर विश्वास करता हूँ, अब हम साथ मिलकर सच्चाई सामने लाएंगे।'
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