📖 दिल का दरिया
पहली जीत
आदित्य के सवाल से बचने के लिए आर्या ने कहा कि उसने नौकरों से सुना था, लेकिन आदित्य को उसकी बात पर पूरा यकीन नहीं हुआ। उसने आर्या की आँखों में देखा, जैसे उसे कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। आर्या ने नज़रें चुरा लीं और कमरे से बाहर जाने लगी। आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा, "रुको।
मुझे सच बताओ।" आर्या का दिल धड़कने लगा। वह सोचने लगी, 'अगर मैंने डायरी की बात बताई, तो वह मुझ पर और शक करेगा।' उसने हिम्मत करके कहा, "मैंने सच में नौकरों से सुना था। आपके दर्द की बात घर में फैली हुई है।" आदित्य ने उसका हाथ छोड़ दिया और गहरी साँस ली। उसने कहा, "ठीक है, मान लेता हूँ।
लेकिन मुझे जानना है कि तुमने मेरे लिए खाना क्यों बनाया?" आर्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "क्योंकि आप मेरे पति हैं। मेरा फर्ज़ है।" आदित्य कुछ नहीं बोला, बस उसे जाते हुए देखता रहा। अगले दिन दोपहर में, घर में एक छोटा सा पारिवारिक समारोह था। सुधा ने अपने गहने पहने थे, लेकिन कुछ देर बाद वह चिल्लाई, "मेरे गहने कहाँ हैं?
मेरा हार और कंगन गायब हैं!" सब लोग हैरान हो गए। सुधा ने आर्या की ओर देखा और कहा, "तुमने चुराए हैं, है ना? तुम्हारे गाँव में ऐसी आदतें होती हैं।" आर्या ने शांति से कहा, "मैंने नहीं चुराए, माँ जी।" सुधा ने ज़ोर से कहा, "तो कहाँ गए? मैंने सुबह पहने थे, और अब नहीं हैं।
तुम्हारे कमरे की तलाशी ली जाए।" आर्या ने सोचा, 'यह साज़िश है। मैंने कल रात सुधा को अपने कमरे में कुछ छिपाते देखा था।' उसने हिम्मत करके कहा, "अगर आपको शक है, तो सभी कमरों की तलाशी ली जाए। मेरे कमरे से पहले आपका कमरा देखा जाए।" सुधा घबरा गई, लेकिन बोली, "पहले तुम्हारा कमरा।" आर्या ने कहा, "नहीं, पहले आपका। क्योंकि आपने ही चोरी की शिकायत की है।" आदित्य ने बीच में आकर कहा, "माँ, आर्या सही कह रही है।
पहले आपका कमरा देखा जाए।" सुधा ने विरोध किया, लेकिन आदित्य ने ज़ोर दिया। सब लोग सुधा के कमरे में गए। वहाँ तलाशी ली गई, तो गहने उसके बिस्तर के नीचे मिले। सुधा का चेहरा पीला पड़ गया।
वह बोली, "यह कैसे हुआ? मुझे नहीं पता था।" आर्या ने शांति से कहा, "माँ जी, आपने खुद ही अपने गहने यहाँ रखे होंगे और भूल गईं।" सुधा ने आर्या को जलती नज़रों से देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली। पूरे परिवार के सामने सुधा की साज़िश का पर्दाफाश हुआ। आदित्य ने आर्या की ओर देखा और उसकी आँखों में सम्मान था।
उसने कहा, "मुझे पता था तुम सच बोल रही हो।" आर्या की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने रोक लिए। परिवार के बुजुर्गों ने आर्या की बहादुरी की तारीफ की। सुधा को शर्मिंदा होकर माफ़ी माँगनी पड़ी, हालाँकि उसने ऐसा नहीं किया, बल्कि वहाँ से चली गई। आदित्य ने आर्या का हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "तुमने आज मुझे गर्व महसूस कराया।" आर्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने बस सच बोला।" आदित्य ने उसका हाथ छोड़ते हुए कहा, "मुझे तुम पर भरोसा है।" उस दिन के बाद, घर में आर्या के प्रति लोगों का नज़रिया बदल गया।
नौकर भी उसका सम्मान करने लगे। आर्या को लगा कि उसकी मेहनत रंग लाई है। लेकिन वह जानती थी कि सुधा इतनी जल्दी हार नहीं मानेगी। उसने सोचा, 'मुझे और सावधान रहना होगा।' शाम को, जब सब अपने कमरों में चले गए, सुधा ने आर्या को बगीचे में बुलाया।
उसकी आँखों में गुस्सा था। उसने धीरे से कहा, "तुमने सोचा था कि तुम जीत गई? यह तो बस शुरुआत है।" आर्या ने शांति से कहा, "माँ जी, मैंने कुछ नहीं किया।" सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं तुम्हें यहाँ से निकालकर रहूँगी।" आर्या ने कुछ नहीं कहा, बस वहाँ से चली गई। सुधा ने आर्या को चोरी के आरोप में फंसाया।






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